बुधवार, 15 जुलाई 2020

सावन में सोमवार से कोई फायदे नहीं मिलता

प्रश्न  सावन में  सोमवार से कोई फायदे नहीं मिलता
उत्तर :- गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में बताया है कि बिल्कुल न खाने वाले यानि
व्रत रखने वाले का योग यानि परमात्मा से मिलने का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
गीता अध्याय 6 श्लोक 16 :- हे अर्जुन यह योग (यानि परमात्मा प्राप्ति के लिए
की गई साधना) न तो बहुत खाने वाले का और न बिल्कुल न खाने वाले का तथा
न बहुत शयन करने वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
 इसलिए व्रत रखना शास्त्रा विरूद्ध होने से व्यर्थ सिद्ध हुआ।

सोमवार व्रत कथा
परमेश्वर कबीर जी ने समझाया है कि तत्वज्ञानहीन मूर्ति पूजक अपनी साधना को श्रेष्ठ बताने के लिए जनता को भ्रमित करने के लिए विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पत्थर के शिवलिंग रखकर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। जो कि शास्त्र विरुद्ध साधना है।

कृपया अधिक जानकारी के लिए संत रामपाल जी महाराज के मंगल प्रवचन साधना चैनल शाम 7:30 से.                     8ं:30 तक अवश्य देखें

बुधवार, 8 जुलाई 2020

गुरु बिन मोक्ष क्यों नहीं

प्रश्न :- क्या गुरू के बिना भक्ति नहीं कर सकते?उत्तर :- भक्ति कर सकते हैं, परन्तु व्यर्थ प्रयत्न रहेगा।प्रश्न :- कारण बताऐं?उत्तर :- परमात्मा का विधान है जो सूक्ष्मवेद में कहा है :-


कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान।
गुरू बिन दोंनो निष्फल है, पूछो वेद पुराण।।
कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरू कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी, गुरू आगे आधीन।।
कबीर, राम कृष्ण बड़े तिन्हूं पुर राजा। तिन गुरू बन्द कीन्ह निज काजा।।
भावार्थ :- गुरू धारण किए बिना यदि नाम जाप की माला फिराते हैं और
दान देते हैं, वे दोनों व्यर्थ हैं। यदि आप जी को संदेह हो तो अपने वेदों तथा
पुराणों में प्रमाण देखें।
श्रीमद् भगवत गीता चारों वेदों का सारांश है। गीता अध्याय 2 श्लोक 7 में
अर्जुन ने कहा कि हे श्री कृष्ण! मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। गीता
अध्याय 4 श्लोक 3 में श्री कृष्ण जी में प्रवेश करके काल ब्रह्म ने अर्जुन से कहा
कि तू मेरा भक्त है। पुराणों में प्रमाण है कि श्री रामचन्द्र जी ने ऋषि वशिष्ठ जी
से नाम दीक्षा ली थी और अपने घर व राज-काज में गुरू वशिष्ठ जी की आज्ञा
लेकर कार्य करते थे। श्री कृष्ण जी ने ऋषि संदीपनि जी से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया
तथा श्री कृष्ण जी के आध्यात्मिक गुरू श्री दुर्वासा ऋषि जी थे।
कबीर परमेश्वर जी हमें समझाना चाहते हैं कि आप जी श्री राम तथा श्री
कृष्ण जी से तो किसी को बड़ा अर्थात् समर्थ नहीं मानते हो। वे तीन लोक के
मालिक थे, उन्होंने भी गुरू बनाकर अपनी भक्ति की, मानव जीवन सार्थक किया।
इससे सहज में ज्ञान हो जाना चाहिए कि अन्य व्यक्ति यदि गुरू के बिना भक्ति
करता है तो कितना सही है? अर्थात् व्यर्थ है।


गुरू के बिना देखा-देखी कही-सुनी भक्ति को लोकवेद के अनुसार
भक्ति कहते हैं। लोकवेद का अर्थ है, किसी क्षेत्रा में प्रचलित भक्ति का ज्ञान जो
तत्वज्ञान के विपरीत होता है। लोकवेद के आधार से यह दास (संत रामपाल दास)
श्री हनुमान जी, बाबा श्याम जी, श्री राम, श्री कृष्ण, श्री शिव जी तथा
देवी-देवताओं की भक्ति करता था। हनुमान जी की भक्ति में मंगलवार का व्रत,
बुन्दी का प्रसाद बाँटना, स्वयं देशी घी का गिच चुरमा खाता था, बाबा हनुमान को
डालडा वनस्पति घी से बनी बुन्दी का भोग लगाता था। हरे राम, हरे कृष्ण,
कृष्ण-कृष्ण हरे-हरे का मन्त्रा जाप करता था। किसी ने बता दिया कि :-
ओम् नाम सबसे बड़ा, इससे बड़ा न कोय।
ऊँ नाम का जाप करे, तो शुद्ध आत्मा होय।।
इस कारण से ओम् नाम का जाप शुरू कर दिया। ओम् नमो शिवायः, यह
शिव का मन्त्रा जाप करता था। ओम् भगवते वासुदेवायः नमः, यह विष्णु जी का
जाप करता था। तीर्थों पर जाना, दान करना, वहाँ स्नान करना, यह भी लोकवेद
के आधार से करने जाता था।
जैसे घर में सुख होते थे तो मैं मानता था कि ये सब मेरी उपरोक्त भक्ति
के कारण हो रहे हैं। जैसे कक्षा में पास होना, विवाह होना, पुत्रा तथा पुत्रियों का
जन्म होना, नौकनी लगना। ये सर्व सुख उपरोक्त साधना से ही मानता था। कबीर
परमेश्वर जी ने सूक्ष्म वेद में कहा है :-
कबीर, पीछे लाग्या जाऊं था, मैं लोक वेद के साथ।
रास्ते में सतगुरू मिले, दीपक दीन्हा हाथ।।
भावार्थ है कि साधक लोकवेद अर्थात् दन्त कथा के आधार से भक्ति कर
रहा था। उस शास्त्राविरूद्ध साधना के मार्ग पर चल रहा था। रास्ते में अर्थात् भक्ति
मार्ग में एक दिन तत्वदर्शी सन्त मिल गए। उन्होंने शास्त्राविधि अनुसार शास्त्रा



प्रमाणित साधना रूपी दीपक दे दिया अर्थात् सत्य शास्त्रानुकूल साधना का ज्ञान
कराया तो जीवन नष्ट होने से बच गया। सतगुरू द्वारा बताये तत्वज्ञान की रोशनी
में पता चला कि मैं गलत भक्ति कर रहा था। श्री मद्भगवत गीता अध्याय 16
श्लोक 23.24 में कहा है कि शास्त्रा विधि को त्यागकर जो साधक मनमाना आचरण
करते हैं, उनको न तो सुख होता है, न सिद्धि प्राप्त होती है और न ही गति अर्थात्
मोक्ष की प्राप्ति होती है अर्थात् व्यर्थ साधना है। फिर गीता अध्याय 16 श्लोक 24
में कहा है कि अर्जुन! इससे तेरे लिए कृर्तव्य और अकृर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्रा
ही प्रमाण हैं।

जो उपरोक्त साधना यह दास (संत रामपाल दास) किया करता था तथा
पूरा हिन्दू समाज कर रहा है, वह सब गीता-वेदों में वर्णित न होने से शास्त्रा विरूद्ध
साधना हुई जो व्यर्थ है।
कबीर, गुरू बिन काहु न पाया ज्ञाना, ज्यों थोथा भुस छडे़ मूढ़ किसाना।
कबीर, गुरू बिन वेद पढै़ जो प्राणी, समझै न सार रहे अज्ञानी।।
इसलिए गुरू जी से वेद शास्त्रों का ज्ञान पढ़ना चाहिए जिससे सत्य भक्ति
की शास्त्रानुकूल साधना करके मानव जीवन धन्य हो जाए

 कृपया अधिक जानकारी के लिए संत रामपाल जी                    महाराज के मंगल प्रवचन साधना चैनल                                 शाम 7:30 से 8:30 तक अवश्य देखें

बुधवार, 1 जुलाई 2020

संत नामदेव जी की कथा

                        संत नामदेव जी की कथा
संत नामदेव जी का जन्म सन् 1270 (विक्रमी संवत् 1327) में छीपा जाति में गाँव-पुण्डरपुर, जिला-सतारा (महाराष्ट्र प्रान्त) में हुआ। स्थानीय गुरूओं के विरोध के कारण नामदेव जी महाराष्ट्र त्यागकर हरिद्वार चले गए। उस समय दिल्ली का सम्राट मोहम्मद बिन तुगलक था। सन् 1325 में किसी ने राजा से कहा कि एक हिन्दु संत नामदेव हिन्दु धर्म का प्रचार कर रहा है। उसके विषय में सुना है कि वह पत्थर की मूर्ति में प्राण स्थापित करके दूध पिला देता है आदि-आदि। राजा ने परीक्षा करने के लिए संत नामदेव जी को दिल्ली बुलाया। राजा के सिपाही संत जी को बाँधकर ले गए। एक गाय को तलवार से गर्दन से काटा गया और संत नामदेव से कहा कि तू जनता को भ्रमित करता फिरता है।इस गाय को जीवित कर नहीं तो तेरे को मृत्यु दंड दिया जाएगा। संत नामदेव जी ने परमेश्वर से रक्षार्थ हृदय से पुकार की। उसी समय गाय जीवित हो गई। नामदेव को गुरूजी के साक्षात दर्शन हुए। गाय जीवित करके अंतर्ध्यान हो गए। मोहम्मद बिन तुगलक ने संत जी से क्षमा याचना की और छोड़ दिया।


‘‘नामदेव जी की भक्ति-श्रद्धा से मंदिर घुमाना’’
गाँव पुण्डरपुर में बीठल भगवान का मंदिर था। उसमें सुबह तथा शाम को आरती होती थी। उस समय छूआछात अधिक थी। एक दिन नामदेव जी मंदिर के पास से बने रास्ते पर जा रहे थे। मंदिर में आरती चल रही थी। पंडित जन हाथों में घंटियाँ तथा खड़ताल लेकर बजा रहे थे। नामदेव जी को भी धुन चढ़ गई। उसने अपनी जूतियाँ हाथों में ली और उनको एक-दूसरी से मारने लगा और मंदिर में पहुँच गया। पंडितों के बीच से भगवान बिठल जी की मूर्ति के सामने खड़ा हो गया। पंडितों ने देखा कि नामदेव ने अपवित्रा जूतियाँ हाथ मेंले रखी हैं। मंदिर में प्रवेश कर गया है। मंदिर अपवित्रा हो गया है। भगवान बिठल रूष्ट हो गए तो अनर्थ हो जाएगा। नामदेव जी को खैंच कर (घसीटकर) मंदिर के पीछे डाल दिया। भक्त नामदेव जी पृथ्वी पर गिरे-गिरे भी जूतियाँ पीट रहे थे, आरती गा रहे थे। उसी क्षण मंदिर का मुख नामदेव जी की ओर घूम गया। पंडित जन मंदिर के पीछे खड़े-खड़े घंटियाँ बजा रहे थे। करिश्मा देखकर घंटियाँ बजाना बंद करके स्तब्ध रह गए। उस मंदिर का मुख सदा उस ओर रहा। गाँव तथा दूर देश के व्यक्ति भी यह चमत्कार देखने आए थे।भक्त नामदेव जी की भक्ति की प्रसिद्धि आग की तरह सारे क्षेत्र में फैल गई।

अधिक जानकारी के लिए देखिए साधना टीवी पर सत्संग.                        7:30 से 8:30 बजे तक

परमेश्वर कबीर जी की सत भक्ति से होते हैं अनेकों लाभ

🧭परमेश्वर कबीर जी की सत भक्ति से होते हैं अनेकों लाभ🧭 कबीर परमेश्वर जी पूर्ण ब्रह्म सर्व सृष्टि रचनहार कुल मालिक चारों युगों में सतलोक से ...