सोमवार, 27 जून 2022

परमेश्वर कबीर जी की सत भक्ति से होते हैं अनेकों लाभ

🧭परमेश्वर कबीर जी की सत भक्ति से होते हैं अनेकों लाभ🧭


कबीर परमेश्वर जी पूर्ण ब्रह्म सर्व सृष्टि रचनहार कुल मालिक चारों युगों में सतलोक से चलकर पृथ्वी पर आते हैं और हर युग में अनेकों लीलाएं करते हैं।
ऐसे 600 वर्ष पहले काशी में कलियुग में आये थे और अनेकों लीलाएं की। अपने शिष्यों को ऐसे ऐसे लाभ दिये जो सिर्फ पूर्ण परमात्मा ही दे सकता है।

एक सर्वानन्द नाम के महर्षि थे। उसकी आदरणीय माता श्रीमती शारदा देवी पाप कर्म फल से पीड़ित थी। उसने कबीर परमात्मा से उपदेश प्राप्त किया तथा उसी दिन कष्ट मुक्त हो गई। 
क्योंकि पवित्र यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्र 32
में लिखा है कि ‘‘कविरंघारिरसि‘‘ अर्थात् (कविर्) कबीर (अंघारि) पाप का शत्रु (असि) है। फिर इसी पवित्र यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में लिखा है कि परमात्मा (एनसः एनसः) अधर्म के अधर्म अर्थात् पापों के भी पाप घोर पाप को भी समाप्त कर देता है।

त्रेतायुग में कबीर परमेश्वर मुनिंद्र नाम से प्रकट हुए तब नल व नील दोनों मोसी मोसी के भाई थे वह दोनों भयंकर कष्ट से पीड़ित थे उन्होंने जगह जगह अपना इलाज करवाके थक चुके थे फिर परमेश्वर ने उनको शरण में लिया और रोग मुक्त किया उनकी कृपा से ही समुंद्र पर पत्थर तैरे धर्मदास जी के वाणी में इसका प्रमाण है।

रहे नल नील जतन कर हार, तब सतगुरु से करी पुकार | जा सत रेखा लिखी अपार, सिंधु पर सिला तिराने वाले|| धन्य- धन्य सत्य कबीर भक्त की पीड़ मिटाने वाले||


द्वापरयुग में द्रोपदी का चीर बढ़ाना, हिरण्यकशिपु से भक्त प्रहलाद की रक्षा करना, दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी के जलन का रोग ठीक करना, रावण का वध करना आदि।


ऐसी ऐसी और भी अनेकों की हैं जो कोई साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता।
कबीर साहेब जी ही पूर्ण परमात्मा सर्व ब्रह्मांडों के मालिक हैं। वेदों प्रमाण है कि वह पूर्ण परमात्मा आयु बढ़ा सकता है और कोई भी रोग को नष्ट कर सकता है।
इन चमत्कारों से स्पष्ट है कि पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी ही हैं।
ऋग्वेद मण्डल 10 सुक्त 161 मंत्र 2, 5, सुक्त 162 मंत्र 5, सुक्त 163 मंत्र 1 - 3 में प्रमाण मिलता है कि पूर्ण परमात्मा आयु बढ़ा सकता है और कोई भी रोग को नष्ट कर सकता है।

और ऐसे ही लाभ आज वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज के द्वारा बताई गई भक्ति साधना करने वाले भक्तों को हो रहे हैं।

नाम कृष्ण कुमार (Krishan kumar) हैं। उत्तम नगर दिल्ली के रहने वाला है। संत रामपाल जी महाराज से नाम उपदेश लेने से पहले हार्ट, ब्लड प्रेशर, पथरी, रीड की हड्डी के दर्द से पीड़ित थे। संत रामपाल जी महाराज से नाम उपदेश लिया, मर्यादा पूर्ण सत भक्ति की। आज बिना किसी दवा से पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं।

नाम संजय दास (Sanjay Das), जिला भोपाल मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं।
इनकी पत्नी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब रहती थी। फेफड़े खराब हो गये थे, हॉस्पिटल में जिंदगी और मौत के बीच में लटक रहे थे। फिर संत रामपाल जी महाराज से प्रार्थना की उनसे नाम उपदेश लेकर सत भक्ति की आज पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं। 

नाम चेतराम (Chetram) है खरगौन मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं इनको संत रामपाल जी महाराज की शरण में आने से पहले यह गायत्री परिवार से जुड़े हुए थे। वहां बताई गई भक्ति करते करते इनको कैंसर की बीमारी हो गई। जिसको लेकर इन्होंने जगह जगह डॉक्टरों को दिखाकर थक चुके थे। फिर किसी ने संत रामपाल जी महाराज के बारे में बताया और उनसे नाम उपदेश लेकर सत भक्ति करने से आज पूरी तरह स्वस्थ हैं।

और ऐसे ही लाभ सभी भक्तों को मिलते हैं और मिल रहे हैं। जिसका प्रमाण है उनके लाखों अनुयाई और उनका परिवार।

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गुरुवार, 23 जून 2022

अविनाशी अजर अमर परमात्मा कविर्देव

🕊अविनाशी अजर अमर परमात्मा कविर्देव🕊

यजुर्वेद अध्याय 5 मन्त्र 32 में लिखा है कि "कविरंघारि: असि, बम्भारि: असि स्वज्योति ऋतधामा असि) कबीर परमेश्वर पापों का शत्रु अर्थात पाप नष्ट करता है, वह बंधनों का शत्रु अर्थात बंधनों से छुड़वाता है। वह स्वप्रकाशित शरीर वाला सतलोक में रहता है। जो कि सभी देवों तथा हम सभी जीव आत्माओं के जनक है। वही समर्थ परमात्मा हैं।

कबीर साहेब जी को 52 (बावन) बार मारने की कोशिश की गई। उनको यातनाएं दी गई, उनको ये यातनाएं इसलिए दी गई थी कि कबीर साहेब जी ने धार्मिक और सामाजिक पाखंड का विरोध किया व सद्ग्रंथो में वर्णित सतभक्ति का प्रकाश फैलाने के लिए जगह-जगह अपना अमर संदेश सुनाया। शास्त्र विरुद्ध साधना कर रहे हिन्दुओं को अपनी वाणियों द्वारा जगाया। 


आज से 600 वर्ष पूर्व परमात्मा के 64 लाख शिष्य हुए। दोनों धर्मों के और सभी वर्गों के व्यक्तियों ने परमेश्वर कबीर साहेब से उपदेश प्राप्त किया क्योंकि परमेश्वर कबीर साहेब के आशीर्वाद से सभी के दुखों का अंत हो जाता था। उन्ही शिष्यों में से एक था दिल्ली का सुल्तान सिकंदर लोधी।

कबीर परमेश्वर जब कलयुग में 600 वर्ष पहले आए तो तत्कालीन सुल्तान सिकंदर लोदी के पीर शेख तकी ने कबीर परमेश्वर से ईष्यावश उन्हें मारने की 52 कुचेष्टाएं की।

 कबीर परमात्मा को ख़त्म करने के लिए हिन्दू और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने बहुत से प्रयास किये। बादशाह सिकंदर लोधी से उनकी झूठी शिकायतें करके उनको कई बार सज़ा करवाने की कोशिश की गयी। ऐसे ही एक बार सिकंदर लोधी ने कबीर साहेब को हाथी से कुचलवाने की सजा दी। कबीर परमात्मा जी के हाथ पाँव बांध कर उन्हें एक मदोन्मत खूनी हाथी के आगे डाल दिया गया। पर जब हाथी कबीर परमात्मा को मारने के लिए आगे बढ़ा तो उसे परमात्मा के स्थान पर एक बब्बर शेर दिखाई दिया। सिकंदर लोधी को भी परमात्मा का विराट रूप दिखाई दिया। हाथी अपनी जान बचा कर भाग गया तथा राजा भी थर्र थर्र काँपता हुआ नीचे आया और कबीर परमेश्वर को दंडवत प्रणाम किया।

शेखतकी ने जुल्म गुजारे, बावन करी बदमाशी | 
खूनी हाथी के आगे‌ डालै, बांध जूड अविनाशी||

गंगा में डुबो कर मारने की कोशिश

जब ये प्रयास भी सफल न हुआ तो कबीर जी को गंगा में डुबो कर मारने की कोशिश की गयी। उनके हाथ-पांव बांध कर उन्हें गंगा में डाल दिया गया पर सर्व शक्तिमान कबीर परमेश्वर जल के ऊपर आराम से बैठे रहे। जब कबीर साहेब नहीं डूबे तो चार पहर तक उनके ऊपर गोलियां और तोपों की बारिश की गयी। सबने अपने परम पिता परमात्मा पर पत्थर बरसाए। पर परमेश्वर कबीर साहेब को कोई हानि नहीं पहुंची। तब कबीर साहेब वहां से अंतर्ध्यान हो गए और अपनी कुटिया में प्रकट हो गए।



कबीर साहेब जी को नीचा दिखाने की कुचेष्टा

एक बार शेखतकी पीर ने कबीर साहेब को नीचा दिखाने के लिए 3 दिन के भंडारे की कबीर साहेब के नाम से सभी आश्रमों में झूठी चिठ्ठी डलवाई थी कि कबीर जी 3 दिन का भंडारा करेंगे, भोजन के बाद एक अशर्फी, एक दोहर भी देंगे।
उनका उद्देश्य ये था कि कबीर जी के पास खाना खिलाने के लिए कुछ होगा नहीं, डरकर भाग जायेगा। लेकिन परमेश्वर कबीर साहेब जी ने अपनी शक्ति का परिचय दिया व 18 लाख लोगों को 3 दिन तक मोहन भोजन कराया और सबको अशर्फी और दोहरें दी। शेखतकी का ये प्रयास भी विफल हुआ व ये सब लीला देख कई लाखों लोगों ने कबीर साहेब जी की दीक्षा ली।
कबीर साहेब ने 3 दिन का भंडारा भी करा दिया था, उनकी महिमा भी हुई। ऐसे ऐसे कई सितम लोगों ने धार्मिक गुरुओं के बहकावे मे आकर परमेश्वर कबीर साहेब जी के साथ किए थे। 

शेख तकी के षड्यंत्र के कारण कबीर परमेश्वर को मारने के लिए गंगा दरिया में डुबाने की कुचेष्टा की गयी, तोप के गोले दागे, खूनी हाथी के सामने डाल दिया, गर्म तेल के कड़ाहे में डाल दिया, एक रात्रि को तलवार से काटा गया। लेकिन सारे षड्यंत्र फैल हो गये थे। क्योंकि वे अविनाशी हैं, जन्म-मृत्यु से परे हैं।

कबीर, हाड चाम लहू ना मोरे, जाने सतनाम उपासी।
तारन तरन अभय पद(मोक्ष) दाता, मैं हूं कबीर अविनाशी।।

पानी से पैदा नहीं, स्वांसा नहीं शरीर।
अन्न आहार करता नहीं, ताका नाम कबीर।।

आज यही स्थिति संत रामपाल महाराज जी के साथ है। संत रामपाल महाराज जी सभी धर्मों के सद्ग्रन्थों में प्रमाणित सत्य भक्ति विधि बताते हैं। जिस कारण से 600 वर्ष पहले हुई घटनाओं को आज फिर से दोहराया जा रहा है लेकिन वर्तमान में सर्व जनता शिक्षित है अब उन अज्ञानियों की दाल नहीं गलने वाली। वर्तमान में परमेश्वर कबीर साहेब जी के अवतार संत रामपाल महाराज जी है। अब समय संत रामपाल जी महाराज जी से दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करने का है।

#कबीरपरमात्मा_अविनाशी_हैं
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बुधवार, 5 अगस्त 2020

बीमारियां क्यों आती हैं


                     बीमारियां क्यों आती है 
आज वर्तमान में  मनुष्य अनेकों बीमारियों से ग्रसित है कोई कैंसर से पीड़ित है तो कोई ऐडस से किसी को ब्लड कैंसर है तो किसी को डायबिटीज है लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि मनुष्य को यह बीमारियां क्यों होती है क्योंकि मनुष्य जीवन हमें पाप और पुण्य पर आधारित होकर मिलता है जिसके ज्यादा पाप कर्म होते हैं उनको कई प्रकार की बीमारियां होती है उनकी अकाल मृत्यु हो जाती है


बीमारी-लक्षण एवं उपाय
संत रामपाल जी महाराज के द्वारा बताई गई भक्ति से अनेकों प्रकार की ऐसी बीमारियां ठीक होती हैं जिसका आज विज्ञान में भी इलाज सम्भव नहीं। पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी की भक्ति मर्यादा में रहकर करने से कैंसर जैसी बीमारी भी ठीक हो जाती हैं।   

दुनिया भर में हजारों लोग अपने अपने आराध्य देवों की पूजा करते हुए भी कैंसर जैसी भयंकर बीमारी से मारे जाते हैं लेकिन संत रामपाल जी महाराज की शरण में आते ही भयंकर बीमारी से ग्रसित रोगी भी स्वस्थ होकर उनके गुण गाते हैं। वेदों में प्रमाण है परमात्मा सतभक्ति करने वाले साधक के असाध्य रोग को खत्म करके 100 वर्ष की आयु प्रदान कर सकता है। यह चमत्कार वर्तमान में सतगुरु रामपाल जी महाराज द्वारा बताई सतभक्ति से दिन-प्रतिदिन हो रहे हैं।

"अधिक जानकारी के लिए Satlok Ashram Youtube चैनल पर visit करें"


बुधवार, 15 जुलाई 2020

सावन में सोमवार से कोई फायदे नहीं मिलता

प्रश्न  सावन में  सोमवार से कोई फायदे नहीं मिलता
उत्तर :- गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में बताया है कि बिल्कुल न खाने वाले यानि
व्रत रखने वाले का योग यानि परमात्मा से मिलने का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
गीता अध्याय 6 श्लोक 16 :- हे अर्जुन यह योग (यानि परमात्मा प्राप्ति के लिए
की गई साधना) न तो बहुत खाने वाले का और न बिल्कुल न खाने वाले का तथा
न बहुत शयन करने वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
 इसलिए व्रत रखना शास्त्रा विरूद्ध होने से व्यर्थ सिद्ध हुआ।

सोमवार व्रत कथा
परमेश्वर कबीर जी ने समझाया है कि तत्वज्ञानहीन मूर्ति पूजक अपनी साधना को श्रेष्ठ बताने के लिए जनता को भ्रमित करने के लिए विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पत्थर के शिवलिंग रखकर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। जो कि शास्त्र विरुद्ध साधना है।

कृपया अधिक जानकारी के लिए संत रामपाल जी महाराज के मंगल प्रवचन साधना चैनल शाम 7:30 से.                     8ं:30 तक अवश्य देखें

बुधवार, 8 जुलाई 2020

गुरु बिन मोक्ष क्यों नहीं

प्रश्न :- क्या गुरू के बिना भक्ति नहीं कर सकते?उत्तर :- भक्ति कर सकते हैं, परन्तु व्यर्थ प्रयत्न रहेगा।प्रश्न :- कारण बताऐं?उत्तर :- परमात्मा का विधान है जो सूक्ष्मवेद में कहा है :-


कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान।
गुरू बिन दोंनो निष्फल है, पूछो वेद पुराण।।
कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरू कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी, गुरू आगे आधीन।।
कबीर, राम कृष्ण बड़े तिन्हूं पुर राजा। तिन गुरू बन्द कीन्ह निज काजा।।
भावार्थ :- गुरू धारण किए बिना यदि नाम जाप की माला फिराते हैं और
दान देते हैं, वे दोनों व्यर्थ हैं। यदि आप जी को संदेह हो तो अपने वेदों तथा
पुराणों में प्रमाण देखें।
श्रीमद् भगवत गीता चारों वेदों का सारांश है। गीता अध्याय 2 श्लोक 7 में
अर्जुन ने कहा कि हे श्री कृष्ण! मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। गीता
अध्याय 4 श्लोक 3 में श्री कृष्ण जी में प्रवेश करके काल ब्रह्म ने अर्जुन से कहा
कि तू मेरा भक्त है। पुराणों में प्रमाण है कि श्री रामचन्द्र जी ने ऋषि वशिष्ठ जी
से नाम दीक्षा ली थी और अपने घर व राज-काज में गुरू वशिष्ठ जी की आज्ञा
लेकर कार्य करते थे। श्री कृष्ण जी ने ऋषि संदीपनि जी से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया
तथा श्री कृष्ण जी के आध्यात्मिक गुरू श्री दुर्वासा ऋषि जी थे।
कबीर परमेश्वर जी हमें समझाना चाहते हैं कि आप जी श्री राम तथा श्री
कृष्ण जी से तो किसी को बड़ा अर्थात् समर्थ नहीं मानते हो। वे तीन लोक के
मालिक थे, उन्होंने भी गुरू बनाकर अपनी भक्ति की, मानव जीवन सार्थक किया।
इससे सहज में ज्ञान हो जाना चाहिए कि अन्य व्यक्ति यदि गुरू के बिना भक्ति
करता है तो कितना सही है? अर्थात् व्यर्थ है।


गुरू के बिना देखा-देखी कही-सुनी भक्ति को लोकवेद के अनुसार
भक्ति कहते हैं। लोकवेद का अर्थ है, किसी क्षेत्रा में प्रचलित भक्ति का ज्ञान जो
तत्वज्ञान के विपरीत होता है। लोकवेद के आधार से यह दास (संत रामपाल दास)
श्री हनुमान जी, बाबा श्याम जी, श्री राम, श्री कृष्ण, श्री शिव जी तथा
देवी-देवताओं की भक्ति करता था। हनुमान जी की भक्ति में मंगलवार का व्रत,
बुन्दी का प्रसाद बाँटना, स्वयं देशी घी का गिच चुरमा खाता था, बाबा हनुमान को
डालडा वनस्पति घी से बनी बुन्दी का भोग लगाता था। हरे राम, हरे कृष्ण,
कृष्ण-कृष्ण हरे-हरे का मन्त्रा जाप करता था। किसी ने बता दिया कि :-
ओम् नाम सबसे बड़ा, इससे बड़ा न कोय।
ऊँ नाम का जाप करे, तो शुद्ध आत्मा होय।।
इस कारण से ओम् नाम का जाप शुरू कर दिया। ओम् नमो शिवायः, यह
शिव का मन्त्रा जाप करता था। ओम् भगवते वासुदेवायः नमः, यह विष्णु जी का
जाप करता था। तीर्थों पर जाना, दान करना, वहाँ स्नान करना, यह भी लोकवेद
के आधार से करने जाता था।
जैसे घर में सुख होते थे तो मैं मानता था कि ये सब मेरी उपरोक्त भक्ति
के कारण हो रहे हैं। जैसे कक्षा में पास होना, विवाह होना, पुत्रा तथा पुत्रियों का
जन्म होना, नौकनी लगना। ये सर्व सुख उपरोक्त साधना से ही मानता था। कबीर
परमेश्वर जी ने सूक्ष्म वेद में कहा है :-
कबीर, पीछे लाग्या जाऊं था, मैं लोक वेद के साथ।
रास्ते में सतगुरू मिले, दीपक दीन्हा हाथ।।
भावार्थ है कि साधक लोकवेद अर्थात् दन्त कथा के आधार से भक्ति कर
रहा था। उस शास्त्राविरूद्ध साधना के मार्ग पर चल रहा था। रास्ते में अर्थात् भक्ति
मार्ग में एक दिन तत्वदर्शी सन्त मिल गए। उन्होंने शास्त्राविधि अनुसार शास्त्रा



प्रमाणित साधना रूपी दीपक दे दिया अर्थात् सत्य शास्त्रानुकूल साधना का ज्ञान
कराया तो जीवन नष्ट होने से बच गया। सतगुरू द्वारा बताये तत्वज्ञान की रोशनी
में पता चला कि मैं गलत भक्ति कर रहा था। श्री मद्भगवत गीता अध्याय 16
श्लोक 23.24 में कहा है कि शास्त्रा विधि को त्यागकर जो साधक मनमाना आचरण
करते हैं, उनको न तो सुख होता है, न सिद्धि प्राप्त होती है और न ही गति अर्थात्
मोक्ष की प्राप्ति होती है अर्थात् व्यर्थ साधना है। फिर गीता अध्याय 16 श्लोक 24
में कहा है कि अर्जुन! इससे तेरे लिए कृर्तव्य और अकृर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्रा
ही प्रमाण हैं।

जो उपरोक्त साधना यह दास (संत रामपाल दास) किया करता था तथा
पूरा हिन्दू समाज कर रहा है, वह सब गीता-वेदों में वर्णित न होने से शास्त्रा विरूद्ध
साधना हुई जो व्यर्थ है।
कबीर, गुरू बिन काहु न पाया ज्ञाना, ज्यों थोथा भुस छडे़ मूढ़ किसाना।
कबीर, गुरू बिन वेद पढै़ जो प्राणी, समझै न सार रहे अज्ञानी।।
इसलिए गुरू जी से वेद शास्त्रों का ज्ञान पढ़ना चाहिए जिससे सत्य भक्ति
की शास्त्रानुकूल साधना करके मानव जीवन धन्य हो जाए

 कृपया अधिक जानकारी के लिए संत रामपाल जी                    महाराज के मंगल प्रवचन साधना चैनल                                 शाम 7:30 से 8:30 तक अवश्य देखें

बुधवार, 1 जुलाई 2020

संत नामदेव जी की कथा

                        संत नामदेव जी की कथा
संत नामदेव जी का जन्म सन् 1270 (विक्रमी संवत् 1327) में छीपा जाति में गाँव-पुण्डरपुर, जिला-सतारा (महाराष्ट्र प्रान्त) में हुआ। स्थानीय गुरूओं के विरोध के कारण नामदेव जी महाराष्ट्र त्यागकर हरिद्वार चले गए। उस समय दिल्ली का सम्राट मोहम्मद बिन तुगलक था। सन् 1325 में किसी ने राजा से कहा कि एक हिन्दु संत नामदेव हिन्दु धर्म का प्रचार कर रहा है। उसके विषय में सुना है कि वह पत्थर की मूर्ति में प्राण स्थापित करके दूध पिला देता है आदि-आदि। राजा ने परीक्षा करने के लिए संत नामदेव जी को दिल्ली बुलाया। राजा के सिपाही संत जी को बाँधकर ले गए। एक गाय को तलवार से गर्दन से काटा गया और संत नामदेव से कहा कि तू जनता को भ्रमित करता फिरता है।इस गाय को जीवित कर नहीं तो तेरे को मृत्यु दंड दिया जाएगा। संत नामदेव जी ने परमेश्वर से रक्षार्थ हृदय से पुकार की। उसी समय गाय जीवित हो गई। नामदेव को गुरूजी के साक्षात दर्शन हुए। गाय जीवित करके अंतर्ध्यान हो गए। मोहम्मद बिन तुगलक ने संत जी से क्षमा याचना की और छोड़ दिया।


‘‘नामदेव जी की भक्ति-श्रद्धा से मंदिर घुमाना’’
गाँव पुण्डरपुर में बीठल भगवान का मंदिर था। उसमें सुबह तथा शाम को आरती होती थी। उस समय छूआछात अधिक थी। एक दिन नामदेव जी मंदिर के पास से बने रास्ते पर जा रहे थे। मंदिर में आरती चल रही थी। पंडित जन हाथों में घंटियाँ तथा खड़ताल लेकर बजा रहे थे। नामदेव जी को भी धुन चढ़ गई। उसने अपनी जूतियाँ हाथों में ली और उनको एक-दूसरी से मारने लगा और मंदिर में पहुँच गया। पंडितों के बीच से भगवान बिठल जी की मूर्ति के सामने खड़ा हो गया। पंडितों ने देखा कि नामदेव ने अपवित्रा जूतियाँ हाथ मेंले रखी हैं। मंदिर में प्रवेश कर गया है। मंदिर अपवित्रा हो गया है। भगवान बिठल रूष्ट हो गए तो अनर्थ हो जाएगा। नामदेव जी को खैंच कर (घसीटकर) मंदिर के पीछे डाल दिया। भक्त नामदेव जी पृथ्वी पर गिरे-गिरे भी जूतियाँ पीट रहे थे, आरती गा रहे थे। उसी क्षण मंदिर का मुख नामदेव जी की ओर घूम गया। पंडित जन मंदिर के पीछे खड़े-खड़े घंटियाँ बजा रहे थे। करिश्मा देखकर घंटियाँ बजाना बंद करके स्तब्ध रह गए। उस मंदिर का मुख सदा उस ओर रहा। गाँव तथा दूर देश के व्यक्ति भी यह चमत्कार देखने आए थे।भक्त नामदेव जी की भक्ति की प्रसिद्धि आग की तरह सारे क्षेत्र में फैल गई।

अधिक जानकारी के लिए देखिए साधना टीवी पर सत्संग.                        7:30 से 8:30 बजे तक

परमेश्वर कबीर जी की सत भक्ति से होते हैं अनेकों लाभ

🧭परमेश्वर कबीर जी की सत भक्ति से होते हैं अनेकों लाभ🧭 कबीर परमेश्वर जी पूर्ण ब्रह्म सर्व सृष्टि रचनहार कुल मालिक चारों युगों में सतलोक से ...